ओम आनंदम
आज हम क्रोध के विषय पर बात करेंगे तो ज्यादा समय ना लेते हुए विषय पर आते हैं| सबसे पहले हम पुराने जो बहुत पहले जो इतिहास में नाम हैं उनको देखें जो सबसे ज्यादा क्रोधी थे| उनके नाम बताएं, और अब आज के समय में जो क्रोधी हैं उनके नाम बताये, नाम आप मित्रों द्वारा आए है इतिहास के नाम आपने बताये दुर्वासा ऋषि, परशुराम, जमदग्नि आज के समय में जो क्रोधी हैं वह हम सभी हैं कोई किसी कम नहीं है| अब देखें इतिहास में जो क्रोध से मुक्त हो गए उनके नाम बताये नाम आप सभी से आये हैं महातम बुद्ध, भगवन महावीर, नानक जी आदि संत पुरुष तो अब ध्यान दें कि ये क्रोध से मुक्त कैसे हो गए? क्योंकि इन्होने ध्यान किया यानि कि ध्यान के द्वारा क्रोध शांत हो गया| अब मैं महत्वपूर्ण बात बताने जा रहा हूँ उसे ध्यान देना कि क्रोध कहाँ से आता है? हमारे अंदर से कहीं बाहर से नहीं, ये क्रोध तो सभी के अन्दर होता है महात्मा बुद्ध के अन्दर भी था, महावीर के अन्दर भी था, लेकिन इनको तो क्रोध आता ही नहीं कारण क्या है? इसका कारण सीधा है कि क्रोध हमें जब आता है जब हमारे अन्दर छिपे अहंकार को जब चोट लगती है तब हमें क्रोध आता है| और अहंकार को चोट कब लगती है? कैसे लगती है? उसका कारण होता है जब हम अपने आपको मुख्य मान लेते हैं, जैसे मैं पिता हूँ, मैं पति हूँ, मैं अध्यापक हूँ, मैं मंत्री हूँ, मैं राजा हूँ आदि आदि अब होता क्या है? जब पुत्र ने पिता से कुछ कह दिया या पत्नी ने पति से कुछ कह दिया या किसी ने भी हमें कुछ कह दिया तो वह बात हमारे अन्दर छिपे अहंकार को लगी जब अहंकार को चोट लगी तो शरीर में कुछ हलचल हुई| हलचल हुई तो वह जुबान पर आगई, और कभी कभी तो हाथों पर भी आजाती है, यही क्रोध होता है, जब हम किसी को अपशब्द कह देते हैं तो सामने वाला भी कुछ कह देता है फिर बात और बढ़ जाती है| अब ध्यान दें जो महात्मा बुद्ध, महावीर, नानक जी आदि जो संत पुरुष रहे ये ध्यानी थे| एक कहानी आपने सुनी होगी कि किसी ने भगवान बुद्ध को गाली दी और भगवन बुद्ध को गाली नहीं लगी उनके शिष्य ने कहा भगवन इसे अभी ठीक किये देते हैं, भगवान बुद्ध बोले तुम्हे कुछ कहा क्या बोले नहीं तो फिर क्या है? मुझे कहा और मुझे कुछ नहीं हुआ| इसका मतलब सीधा सा है कि उनका अहंकार नहीं रहा| और जिसका अहंकार गिर जाता है उसे कभी क्रोध आ ही नहीं सकता| क्यूंकि अहंकारी पुरुष कभी अच्छा मित्र नहीं बन सकता| और अहंकार गिराने के लिए सही अम्र्ग है ध्यान| ध्यान के द्वारा आप अहंकार से तो छूटेंगे साथ ही करुणावान और मैत्रीपूर्ण होंगे|
||ओम आनंदम||

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