किसी नदी के पास जाएं, नदी पास में ना हो तो वृक्ष के पास जाये उनसे से बातें करें, उनको को स्पर्श करें, वृक्ष है तो उसे गले लगाएं, उन्हें महसूस करें, उनके पास समय बिताएं बैठें| वृक्ष है या नदी उन्हें भी महसूस होने दें कि आप एक अच्छे मनुष्य है अच्छे प्राणी हैं| और आप उन्हें चोट पहुंचाने नहीं आये हैं| ऐसा आप प्रतिदिन करें, धीरे-धीरे मित्रता बढ़ेंगी और आप महसूस करेंगे कि जब आप आते है, उसी समय उसकी भाव-दशा में अंतर आता है। जब आप उसके पास बैठेंगे तो आपको कई बातें में समझ आने लगेंगी; और यदि आप उदास हैं अकेलें हैं कोई साथी मित्र नहीं है और समय बिताना है किसके पास जाएँ तो कभी इन मित्रों को भी ध्यान में लायें इनके पास आए है तो इनकी उपस्थिति मात्र में आपकी उदासी खो जाएगी। और केवल तभी आप समझ सकेंगे कि हम सब परस्पर निर्भर हैं। हम वृक्ष को, नदी को आनंदित कर सकते है और नदी, वृक्ष हमें आनंदित कर सकते है। और यह पूरा जीवन ही परस्पर निर्भर है। इसी को मैत्री कहा है और जहाँ मैत्री होती है, वहीँ सुख शांति, प्रेम, आनंद की धारा अपने आप ही बहने लगती है|




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