परमात्मा से मिलन की इच्छा किसकी नहीं होती सदियों से मनुष्य ऋषि मुनि इसी प्रयास में लगे रहे कि हमें परमात्मा मिल जाये न जाने कितने ही मनुष्य वर्षों तप करते रहे परमात्मा मिलन के लिए और जो ऋषि मुनि हुए वो क्या अलग से कहीं और से आये थे वो भी तो हममें से ही हुए वो भी तो प्राणी ही थे अब उन ऋषियों मुनियों कि तरफ ध्यान दें कुछ ने घर परिवार छोड़ कर सन्यास ले लिया, कुछ परिवार के साथ रहते हुए परमात्मा के ध्यान में लगे रहे क्या वास्तव में परिवार के साथ रह कर भी परमात्मा को प्राप्त किया जा सकता है तो मैं कहूँगा हाँ| बहुत से ऐसे ऋषि मुनि हुए जो अपने परिवार के साथ रहकर परमात्मा से मिलन कर सके जमदग्नि, कश्यप, गौतम आदि आदि ऐसे बहुत से ऋषि मुनि हुए लेकिन फिर भी कुछ लोगों ने इतनी बड़ी खाई पैदा करदी कि परमात्मा से मिलन के लिए परिवार को छोड़ कर एकांत में जाना होगा तभी परमात्मा से मिलन को सकेगा और सभी मानते भी हैं परन्तु हमारे ऋषि मुनियों के बारे में ध्यान नहीं रखते अगर हम गहरे में जाये और देखें तो पाएंगे कि परिवार के साथ रहकर जितनी सहजता से परमात्मा से मिलन कर सकते हैं उतने सहजता से परिवार से अलग रहकर नहीं|
अब मैं आपको और गहरे में लेकर चलता हूँ मनु सतरूपा का नाम सुना तो होगा जानते भी होंगे कि ब्रह्मा जी ने श्रष्टि कि रचना करने के लिए मनु सतरूपा कि उत्पत्ति की और इनसे पांच संतान हुई दो पुत्र और तीन पुत्रियाँ| एक पुत्री देवहुति ब्रह्माजी के आदेश से ही कर्दम मुनि जी को ब्याही गई मुनि थे परमात्मा की राह पर चल रहे थे फिर क्यों गृहस्थी के चक्कर में पड़ गए ? क्योंकि परमात्मा कि ही आज्ञा थी कि वे सृष्टि को बढाने में आगे बढ़ें| और गृहस्थी में रहकर उन्होंने परमात्मा से मिलन किया| ये ही अकेले ऋषि गृहस्थी वाले नहीं थे और भी थे और गहरे में जाये कर्दम मुनि और देवहुति से नो कन्या हुईं जो जाने माने नो ऋषियों को ब्याही गई| मरिचि, अत्री, अंगीरा, पुलत्स्य, पुलह, कृतु, भृगु, वशिष्ठ और अथर्व ऋषि | ये मैं आपको क्यों बता रहा हूँ मैं चाहता हूँ कि जो खाई लोगों ने पैदा की है आप उससे बच सकें और परमात्मा से मिलन कर सकें घर परिवार छोड़ने के लिए परमात्मा ने नहीं कहा ये तो हममें से ही किसी ने कह दिया और हमने मान लिया बस यही तो समझना है कि मान लिया मान लिया परमात्मा है मान लिया परमात्मा नहीं है मान लिया मान लिया लेकिन जाना नहीं जाना क्यों नहीं? मानो मत जानो मैं यही कहता रहता हूँ मेरा प्रयास यही है कि सब जानने वाले बने मानने वाले नहीं परमात्मा से मिलन करना है तो जानने कि जिज्ञासा रखो जानने की कोशिश करो परमात्मा यही चाहता है कि मेरे बच्चे खुश रहें और ख़ुशी कभी अकेलेपन से नहीं आती सामूहिक, पारिवारिक ख़ुशी जो है, उस जैसी ख़ुशी कहीं और नहीं चले जाओ पर्वत पर, चले जाओ कंदराओं में, चले जाओ गंगा नदी के किनारे इतना सुख इतना आनंद कही नहीं है मित्रो इतना सरल, इतना सहज है परमात्मा मिलन परिवार के साथ रहकर| अब सोचें कि आजकल कि भा दौड़ भरी जिंदगी में समय नहीं रहा कि परिवार का भरण पोषण करके बच्चों को खुश रखके फिर समय निकाले नहीं हो सकता यही सब कहते हैं सुर मैं कहता हूँ कि बस एक घंटा मेरे कहने पर निकालें जो समय आप मोर्निग वाक के लिए निकालते हैं उसीमें से कुछ समय निकालें और ध्यान करें ध्यान के लिए तो बस बीस मिनट ही काफी हैं एक बार करके देखें और जाने कि परिवार में रहकर परमात्मा से मिलन कितना सरल और सहज है |




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